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सावन में क्या करने से सांसारिक सुखों की होगी प्राप्ति और महालक्ष्मी होंगी प्रसन्न-जानिये

[Edited By: Vijay]

Friday, 23rd July , 2021 03:19 pm

शास्त्रों के अनुसार बेलपत्र के वृक्ष की जड़ों में माँ गिरिजा, तने में माँ महेश्वरी, इसकी शाखाओं में माँ दक्षयायनी, बेल पत्र की पत्तियों में माँ पार्वती, इसके फूलों में माँ गौरी और बेल पत्र के फलों में माँ कात्यायनी का वास हैं।
हमारे शास्त्रों में बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बिल वृक्ष में माँ लक्ष्मी का भी वास है अत: घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं, जातक वैभवशाली बनता है।
बेलपत्र से भगवान शिव का पूजन करने से समस्त सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है, धन-सम्पति की कभी भी कमी नहीं होती है।

बेलपत्र ऐसे होने चाहिए शिव पूजा में :—

एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए।पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें।एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं।शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं।बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में बिल्व पत्र के वृक्ष को ” श्री वृक्ष ” भी कहा जाता है इसे ” शिवद्रुम ” भी कहते है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि बेल पत्र के तीनो पत्ते त्रिनेत्रस्वरूप् भगवान शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं। बिल्व पत्र के पूजन से सभी पापो का नाश होता है ।

स्कंदपुराण’ में बेल पत्र के वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि एक बार माँ पार्वती ने अपनी उँगलियों से अपने ललाट पर आया पसीना पोछकर उसे फेंक दिया , माँ के पसीने की कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, कहते है उसी से बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ।

बेलपत्र के पेड़ की टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़ना चाहिए।

शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना बेलपत्र के बिना पूरी नहीं होती। लेकिन एक बेलपत्र में तीन पत्तियां अवश्य ही होनी चाहिए.तभी वह बिलपत्र शिवलिंग पर चढ़ने योग्य होता है ।

भगवान शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय जल की धारा भी जरूर चढ़ाएं।

यह ध्यान दीजिये कि बेलपत्र की पत्तियां कटी फटी या टूटी ना हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।

बेलपत्र को भगवान शिव पर चिकनी तरफ से ही अर्पित करें।

अगर बेलपत्र पर ॐ नम: शिवाय या राम राम लिखकर उसे भगवान भोलेनाथ पर अर्पित किया जाय तो यह बहुत ही पुण्यदायक होता है ।

शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन बेलपत्र का पूजन करने से समस्त पापो का नाश होता है।

तृतीया तिथि के स्वामी देवताओं के कोषाध्यक्ष एवं भगवान भोलाथ के प्रिय कुबेर जी है । तृतीया को बेलपत्र चढ़ाकर कुबेर जी की पूजा करने , उनके मन्त्र का जाप करने से अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। और अगर कुबेर जी की पूजा बेल के वृक्ष के नीचे बैठकर, अथवा शिव मंदिर में की जाय तो पीढ़ियों तक धन की कोई भी कमी नहीं रहती है ।

शि‍व को बेलपत्र अर्पित करते वक्त और इसे तोड़ते समय कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी होता है ।

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है। जो कि भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। ऐसी मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का मस्तिष्क शीतल रहता है। पूजा में इनका प्रयोग करने से वे बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं।

बेलपत्र तोड़ने के नियम:–

भूलकर भी चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथियों के साथ-साथ सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़नी चाहिए।शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे किसी भी तरह का पाप नहीं लगेगा। जो स्कंदपुराम में बताया गया है।

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।। (स्कंदपुराण)

कभी भी बेलपत्र को टहनी सहित नहीं तोड़ना चाहिए। बल्कि बेलपत्र चुन-चुनकर तोड़ना चाहिए। जिससे कि वृक्ष को नुकसान न पहुंचे। इसके साथ ही बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम कर लेना चाहिए।

बेल के वृक्ष का धार्मिक महत्व हैं, क्योकि बिल्व का वृक्ष भगवान शिव का ही रूप है।

बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिव लिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता हैं। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं।

पूजन में इसकी मूल यानी जड़ को सींचा जाता हैं।

बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्।य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति।स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥ (शिवपुराण)

भावार्थ: बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।

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